लखनऊ केसरी से मुकुंद सिंह की रिपोर्ट
मेरठ के वरिष्ठ पत्रकार राजेश अवस्थी की आत्महत्या सिर्फ एक व्यक्ति की मौत नहीं, बल्कि उस पूरे निम्न और मध्यम वर्गीय पत्रकार समाज की दर्दनाक कहानी है, जो पूरी जिंदगी दूसरों की आवाज़ उठाते-उठाते खुद खामोश हो जाता है।
40 साल तक अखबारों में डेस्क पर बैठकर खबरें बनाने वाले राजेश अवस्थी ने शायद कभी नहीं सोचा होगा कि रिटायरमेंट के बाद जिंदगी इतनी कठिन हो जाएगी। सीमित वेतन, मामूली पेंशन, घर की जिम्मेदारियां, बीमारी, बेरोजगार बेटा और लगातार बढ़ती आर्थिक परेशानियां… आखिरकार उन्हें अंदर से तोड़ती चली गईं।
ये सिर्फ एक पत्रकार की कहानी नहीं है…
ये उन हजारों ईमानदार पत्रकारों की सच्चाई है जो छोटे शहरों और राज्यों में दिन-रात मेहनत करते हैं, लेकिन रिटायरमेंट के बाद ना आर्थिक सुरक्षा मिलती है और ना स्वास्थ्य की गारंटी।
आज सवाल सिर्फ राजेश अवस्थी की मौत का नहीं है, सवाल उस व्यवस्था का है जहां 40 साल नौकरी करने वाला इंसान बुढ़ापे में खुद को असहाय महसूस करता है।
पत्रकारिता में चमक दिखती है, लेकिन अंदर की सच्चाई अक्सर बहुत दर्दनाक होती है ।



