जिस बैंक में आम आदमी अपनी मेहनत की कमाई जमा करने के लिए घंटों लाइनों में खड़ा रहता है, वहीं नई नोटों की गड्डी के लिए उसे दर-दर भटकना पड़ता है। बैंक काउंटर पर “स्टॉक नहीं है” का बहाना मिलता है, लेकिन बाहर खड़े दलाल के पास हर गड्डी मौजूद रहती है। सवाल सिर्फ नोटों का नहीं, बल्कि उस व्यवस्था का है जहाँ आम आदमी की जरूरत को कुछ लोगों की कमाई का जरिया बना दिया गया है।हैरानी इस बात की नहीं कि भ्रष्टाचार है, बल्कि इस बेशर्मी पर है कि यह सब खुलेआम चल रहा है। हजार रुपये की नई गड्डी के बदले पंद्रह सौ वसूलने वाले दलाल आखिर नोट कहीं और से नहीं लाते। साफ है कि इस खेल में अंदरूनी मिलीभगत शामिल है और आम आदमी की खुशियाँ इसी काले कारोबार की भेंट चढ़ रही हैं।लखनऊ के विभिन्न बैंकों में ₹10 और ₹20 की नई करेंसी आम ग्राहकों को उपलब्ध नहीं हो पा रही है, लेकिन जैसे ही कोई एजेंट या दलाल के पास जाता है, वही नोट तुरंत मिल जाते हैं। शादी-विवाह का समय आते ही यह स्थिति और भयावह हो जाती है, जब लोग अपने ही पैसे के बदले अतिरिक्त रकम चुकाने को मजबूर हो जाते हैं। यह स्थिति सीधे तौर पर व्यवस्था की पारदर्शिता और जवाबदेही पर सवाल खड़े करती है। आरबीआई और सरकार को इस ओर गंभीरता से ध्यान देने की जरूरत है ताकि आम जनता को उसके अधिकार के लिए किसी बिचौलिए का सहारा न लेना पड़े।सच यह है कि तिजोरियाँ खाली नहीं, नीयत खोखली हो चुकी है। जब तक बैंक का काम गली के मोड़ों पर दलाल तय करेंगे, तब तक व्यवस्था पर सवाल उठते रहेंगे। क्या हम सचमुच सभ्य समाज में रह रहे हैं, या ऐसे दौर में जहाँ हर सुविधा की एक “अघोषित रिश्वत” तय हो चुकी है l
बैंक के काउंटर पर ‘स्टॉक खत्म’, दलाल के पास ‘नई करेंसी तैयार ..
जिस बैंक में आम आदमी अपनी मेहनत की कमाई जमा करने के लिए घंटों लाइनों में खड़ा रहता है, वहीं नई नोटों की गड्डी के लिए उसे दर-दर भटकना पड़ता है। बैंक काउंटर पर “स्टॉक नहीं है” का बहाना मिलता है, लेकिन बाहर खड़े दलाल के पास हर गड्डी मौजूद रहती है। सवाल सिर्फ नोटों का नहीं, बल्कि उस व्यवस्था का है जहाँ आम आदमी की जरूरत को कुछ लोगों की कमाई का जरिया बना दिया गया है।हैरानी इस बात की नहीं कि भ्रष्टाचार है, बल्कि इस बेशर्मी पर है कि यह सब खुलेआम चल रहा है। हजार रुपये की नई गड्डी के बदले पंद्रह सौ वसूलने वाले दलाल आखिर नोट कहीं और से नहीं लाते। साफ है कि इस खेल में अंदरूनी मिलीभगत शामिल है और आम आदमी की खुशियाँ इसी काले कारोबार की भेंट चढ़ रही हैं।लखनऊ के विभिन्न बैंकों में ₹10 और ₹20 की नई करेंसी आम ग्राहकों को उपलब्ध नहीं हो पा रही है, लेकिन जैसे ही कोई एजेंट या दलाल के पास जाता है, वही नोट तुरंत मिल जाते हैं। शादी-विवाह का समय आते ही यह स्थिति और भयावह हो जाती है, जब लोग अपने ही पैसे के बदले अतिरिक्त रकम चुकाने को मजबूर हो जाते हैं। यह स्थिति सीधे तौर पर व्यवस्था की पारदर्शिता और जवाबदेही पर सवाल खड़े करती है। आरबीआई और सरकार को इस ओर गंभीरता से ध्यान देने की जरूरत है ताकि आम जनता को उसके अधिकार के लिए किसी बिचौलिए का सहारा न लेना पड़े।सच यह है कि तिजोरियाँ खाली नहीं, नीयत खोखली हो चुकी है। जब तक बैंक का काम गली के मोड़ों पर दलाल तय करेंगे, तब तक व्यवस्था पर सवाल उठते रहेंगे। क्या हम सचमुच सभ्य समाज में रह रहे हैं, या ऐसे दौर में जहाँ हर सुविधा की एक “अघोषित रिश्वत” तय हो चुकी है l



